हमारे हिन्दू धर्म में एकादशी के व्रत का बहुत महत्त्व है, इसमें भगवान विष्णु की पूजा की जाती है।  हर साल कुल 24/25 एकादशी के व्रत होते है, जिसमे से हर महीने 2 व्रत होते है इसी तरह अप्रैल के महीने में कामदा एकादशी का व्रत होता है सभी एकादशीयो की तरह कामदा एकादशी में भी व्रत की कथा को सुनना और पढ़ना बहुत ही शुभ और लाभकारी माना जाता है। इस पोस्ट में हम आपको कामदा एकादशी 2021 की व्रत कथा हिंदी में बताने वाले है - Kamada Ekadashi 2021 Vrat Katha In Hindi 


Kamada Ekadashi Vrat Katha in Hindi - कामदा आमलकी एकादशी व्रत कथा इन हिंदी
Kamada Ekadashi Vrat Katha in Hindi 



कामदा एकादशी 2021 की व्रत कथा हिंदी में - Shattila Ekadashi 2021 Vrat Katha In Hindi

एक पौराणिक कथा के अनुसार, यह कथा भोगीपुर नाम के एक नगर की है, जिसके राजा पुंडरीक थे। भोगीपुर नगर में अप्सरा, किन्नर और गंधर्व रहते थे। इसी नगर में अत्यंत वैभवशाली स्त्री पुरुष ललिता और ललित रहते थे। उन दोनों के बीच इतना स्नेह था कि वह कुछ देर के लिए भी एक दूसरे से अलग नहीं रह पाए थे।





ललित राजा के दरबार में एक दिन गंधर्वों के साथ गान करने पहुंचा। लेकिन गाते-गाते उसे ललिता की याद आ गई और उसका सूर बिगड़ गया। इस पर क्रोधित राजा पुंडरीक ने ललित को राक्षस बनने का श्राप दे दिया और उसी क्षण ललित विशालकाय राक्षस बन गया। उसका शरीर आठ योजन का हो गया।


उसकी पत्नी ललिता को इस बारे में मालूम हुआ तो वह बहुत दुखी हो गई और कोई रास्ता निकालने की कोशिश करने लगी। पति के पीछे-पीछे घूमती ललिता विन्ध्यचल पर्वत पहुंची। वहाँ उसे श्रृंगी ऋषि मिले। ललिता ने सारा हाल बताया और श्रृंगी ऋषि से कुछ उपाय बताने का अनुरोध किया। श्रृंगी ऋषि ने ललिता को कहा कि चैत्र शुक्ल एकादशी आने वाली है, जिसका नाम कामदा एकादशी है। इसकी व्रत करने से मनुष्य के सब कार्य सिद्ध होते हैं। यदि आप कामदा एकादशी का व्रत कर उसके पुण्य का फल अपने पति को दे तो वह शीघ्र ही राक्षसिनी से मुक्त हो जाएगा और राजा का श्राप भी अवश्यमेव शांत हो जाएगा।





मुनि की यह बात सुनकर ललिता ने चैत्र शुक्ल एकादशी व्रत करना शुरू कर दिया। द्वादशी के दिन वह ब्राह्मणों को भोजन कराती और दान देती है। एकादशी व्रत का फल अपने पति को हुआ भगवान से इस प्रकार प्रार्थना करने लगी- हे प्रभो! मैंने जो यह व्रत किया है, उसका फल मेरे पतिदेव को प्राप्त हो जाए, जिससे वह राक्षसिनी से मुक्त हो जाएं।



एकादशी के फल से ही उसका पति राक्षसिनी से मुक्त होकर अपने पुराने स्वरूप को प्राप्त हुआ। फिर कई सुंदर वस्त्राभूषणों से युक्त होकर ललिता के साथ विहार करने लगा। उसके पश्चात वे दोनों विमान में बैठकर स्वर्गलोक को चले गए। ऋषि मुनि कहने लगे कि हे राजन्! इस व्रत को विधिपूर्वक करने से सभी पाप नाश हो जाते हैं और राक्षस आदि की योनि भी छूट जाती है। संसार में इसके बराबर नहीं और दूसरा व्रत नहीं है। इसकी कथा पढ़ने या सुनने से वाजपेय यज्ञ का फल प्राप्त होता है।



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