हमारे हिन्दू धर्म में एकादशी के व्रत का बहुत महत्त्व है, इसमें भगवान विष्णु की पूजा की जाती है।  हर साल कुल 24/25 एकादशी के व्रत होते है, जिसमे से हर महीने 2 व्रत होते है इसी तरह जून के महीने में अपरा एकादशी का व्रत होता है। अपरा एकादशी को हम अचरा एकादशी के नाम से भी जानते है।


सभी एकादशियों की तरह अपरा एकादशी (Apara Ekadashi) में भी व्रत की कथा (Vrat Katha) को सुनना और पढ़ना बहुत ही शुभ और लाभकारी माना जाता है। इस पोस्ट में हम आपको अपरा एकादशी व्रत की कहानी हिंदी में - Apara Ekadashi Vrat Ki Kahani in Hindi


Apara Ekadashi Vrat Ki Kahani in Hindi - अपरा एकादशी व्रत की कहानी हिंदी में
Apara Ekadashi Vrat Ki Kahani in Hindi



अपरा एकादशी (अचरा एकादशी) व्रत की कहानी हिंदी में - Apara Ekadashi Vrat Ki Kahani in Hindi

अपरा एकादशी के व्रत का माहात्म्य बताने वाली कहानियां पौराणिक ग्रंथों में मिलती है। एक कहानी के अनुसार किसी राज्य में महीध्वज नाम का एक बहुत ही धर्मात्मा राजा था। राजा महीध्वज जितना नेक था उसका छोटा भाई वज्रध्वज उतना ही पापी था। वज्रध्वज महीध्वज से द्वेष करता था और उसे मारने के षड़यंत्र रचता रहता था। एक बार वह अपने मंसूबे में कामयाब हो जाता है और महीध्वज को मारकर उसे जंगल में फिंकवा देता है और खुद राज करने लगता है। अब असामयिक मृत्यु के कारण महीध्वज को प्रेत का जीवन जीना पड़ता है। वह पीपल के पेड़ पर रहने लगता है। उसकी मृत्यु के पश्चात राज्य में उसके दुराचारी भाई से तो प्रजा दुखी थी ही साथ ही अब महीध्वज भी प्रेत बनकर आने जाने वाले को दुख पंहुचाते। 







लेकिन उसके पुण्यकर्मों का सौभाग्य कहिये की उधर से एक पंहुचे हुए ऋषि गुजर रहे थे। उन्हें आभास हुआ कि कोई प्रेत उन्हें तंग करने का प्रयास कर रहा है। अपने तपोबल से उन्होंनें भूत के भूत को देख लिया और उसका भविष्य सुधारने का जतन सोचने लगे। सर्वप्रथम उन्होंने प्रेत को पकड़कर उसे अच्छाई का पाठ पढ़ाया फिर उसके मोक्ष के लिये स्वयं ही अपरा एकादशी का व्रत रखा और संकल्प लेकर अपने व्रत का पुण्य प्रेत को दान कर दिया। इस प्रकार उसे प्रेत जीवन से मुक्ति मिली और बैकुंठ गमन कर गया।



एक दूसरी अन्य कहानी के अनुसार एक बार एक राजा ने अपने राज्य में एक बहुत ही मनमोहक उद्यान तैयार करवाया। इस उद्यान में इतने मनोहर पुष्प लगते कि देवता भी आकर्षित हुए बिना नहीं रह सके और वे उद्यान से पुष्प चुराकर ले जाते। राजा चोरी से परेशान, लगातार विरान होते उद्यान को बचाने के सारे प्रयास विफल नज़र आ रहे थे। अब चोर कोई इंसान करे तो पकड़ में आये देवता दबे पांव आते और अपना काम कर निकल जाते किसी को कानों कान खबर नहीं होती। अब राजपुरोहितों को याद किया गया। सभी ने अंदाज लगाया कि है तो किसी दैविय शक्ति का काम किसी इंसान की हिम्मत तो नहीं हो सकती उन्होंने सुझाव दिया कि भगवान श्री हरि के चरणों में जो पुष्प हम अर्पित करते हैं उन्हें उद्यान के चारों और डाल दिया जाये। देखते हैं बात बनती है या नहीं। और तो कोई विकल्प था नहीं ऐसा ही किया गया। देवता और अप्सराएं नित्य की तरह आये लेकिन दुर्भाग्य से एक अप्सरा का पैर भगवान विष्णु को अर्पित किये पुष्प पर रखा गया जिससे उसके समस्त पुण्य समाप्त हो गये और वह अन्य साथियों के साथ उड़ान न भर सकी।


यह भी पढ़े- अपरा एकादशी के बाद जून में दूसरी एकादशी होगी निर्जला एकादशी, यहाँ पढ़े इस एकादशी की व्रत कथा 


सुबह होते ही इस अद्वितीय युवती को देखकर सब हैरान राजा को खबर की गई राजा भी देखते ही सब भूल कर मुग्ध हो गये। अप्सरा ने अपना अपराध कुबूल करते हुए सारा वृतांत कह सुनाया और अपने किये पर पश्चाताप किया। तब राजा ने कहा कि हम आपकी क्या मदद कर सकते हैं। तब उसने कहा कि यदि आपकी प्रजा में से कोई भी ज्येष्ठ कृष्ण एकादशी का उपवास रखकर उसका पुण्य मुझे दान कर दे तो मैं वापस लौट सकती हूं। राजा ने प्रजा में घोषणा करवा दी ईनाम की रकम भी तय कर दी लेकिन कोई उत्साहजनक प्रतिक्रिया नहीं मिली। राजा पुरस्कार की राशि बढाते-बढ़ाते आधा राज्य तक देने पर आ गया लेकिन कोई सामने नहीं आया। किसी ने एकादशी व्रत के बारे में तब तक सुना भी नहीं था। न राजा ही जानता था न पुरोहित प्रजा में जानने का तो सवाल ही नहीं होता। 


परेशान अप्सरा ने चित्रगुप्त को याद किया तब अपने बही खाते से देखकर जानकारी दी कि इस नगर में एक सेठानी से अंजाने में एकादशी का व्रत हुआ है यदि वह संकल्प लेकर व्रत का पुण्य तुम्हें दान कर दे तो बात बन सकती है। उसने राजा को यह बात बता दी। राजा ने ससम्मान सेठ-सेठानी को बुलाया। पुरोहितों द्वारा संकल्प करवाकर सेठानी ने अपने व्रत का पुण्य उसे दान में दे दिया। जिससे अप्सरा राजा व प्रजा का धन्यवाद कर स्वर्गलौट गई। वहीं अपने वादे के मुताबिक सेठ-सेठानी को राजा ने आधा राज्य दे दिया। राजा अब तक एकादशी के महत्व को समझ चुका था उसने आठ से लेकर अस्सी साल तक राजपरिवार सहित राज्य के सभी स्त्री-पुरुषों के लिये वर्ष की प्रत्येक एकादशी का उपवास अनिवार्य कर दिया।



अन्य जानकारी-


🎯 अपरा एकादशी कब है, इसका शुभ मुहूर्त व अन्य सभी जानकारी यहाँ देखें। 


🎯 अपरा एकादशी 2021 का पारण समय यहाँ देखें हिंदी में 


🎯 अपरा एकादशी के व्रत का क्या महत्त्व है, यहाँ पढ़े पूरी जानकारी 


यह भी पढ़े-

Post a Comment

Please share our post with your friends for more learning and earning.

Previous Post Next Post